שלום
मंदिर और शांति
וְשָׁפַט בֵּין הַגּוֹיִם וְהוֹכִיחַ לְעַמִּים רַבִּים וְכִתְּתוּ חַרְבוֹתָם לְאִתִּים וַחֲנִיתוֹתֵיהֶם לְמַזְמֵרוֹת לֹא־יִשָּׂא גוֹי אֶל־גּוֹי חֶרֶב וְלֹא־יִלְמְדוּ עוֹד מִלְחָמָה׃
And He shall judge between the nations, And shall decide for many peoples; And they shall beat their swords into plowshares, And their spears into pruninghooks; Nation shall not lift up sword against nation, Neither shall they learn war any more.
सीखने का पर्वत
यशायाह और मीका दोनों में जातियाँ जीतने या जीते जाने नहीं आतीं। वे शिक्षा पाने आती हैं, और शांति बनाने के लिए लौटती हैं। वही भविष्यवाणी दोनों पुस्तकों में लगभग शब्दशः आती है।
וְיָשְׁבוּ אִישׁ תַּחַת גַּפְנוֹ וְתַחַת תְּאֵנָתוֹ וְאֵין מַחֲרִיד כִּי־פִי ה׳ צְבָאוֹת דִּבֵּר׃
But they shall sit every man under his vine and under his fig-tree; And none shall make them afraid; For the mouth of the LORD of hosts hath spoken.
‘वे न हानि करेंगे न नाश’
यशायाह का पवित्र पर्वत का दर्शन परमेश्वर के ज्ञान से भरे संसार में समाप्त होता है। रामबाम अपनी पूरी विधि-संहिता इसी पद से समाप्त करते हैं।
रामबाम का संयम
रामबाम ज़ोर देते हैं कि मसीहाई युग में प्राकृतिक संसार नहीं बदलेगा; भेड़िये और मेमने जैसे चित्र दृष्टांत हैं। ऋषि उस समय की लालसा दूसरों पर शासन के लिए नहीं, तोराह और प्रज्ञा के लिए मुक्त होने के लिए रखते थे, बिना अकाल और बिना युद्ध के।